Monday, November 2, 2026
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बदल रही है देश की सियासी फिजा

बदल रही है देश की सियासी फिजा

रामलीला मैदान की इस रैली का एक संदेश साफ है: लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती, बल्कि बाकी दिनों में सवाल पूछने वाली नागरिक भी होती है। और जब सवाल पूछने वाले नागरिक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरते हैं, तो लोकतंत्र की सेहत पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

डॉ. सत्य वीर सिंह

रामलीला मैदान में यह सिर्फ एक रैली नहीं थी, यह उन तमाम आवाजों का संगम था जिन्हें अक्सर सत्ता के शोर में अनसुना कर दिया जाता है! राहुल गांधी ने कहा था कि यह शिव की बारात है, इसमें हर कोई आ सकता है। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस बात की एक तस्वीर दिखाई दी।

इस रैली में किसान थे, नौजवान थे, मजदूर थे, शिक्षक थे, अधिवक्ता थे, छात्र थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे और बड़ी संख्या में आम नागरिक भी थे। अलग-अलग विचार, अलग-अलग पेशे और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक मंच के नीचे जुटे दिखाई दिए।

इस रैली की सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ नहीं थी, बल्कि मैदान के बाहर तक दिखाई देने वाली जनभागीदारी थी। आयोजकों के लाखों लोगों के पहुंचने के दावे और पुलिस के अनुमान भले ही अलग-अलग हों, लेकिन यह स्पष्ट है कि दिल्ली में विपक्ष ने एक बड़ा जनसमूह जुटाया है।

अब इस रैली का वास्तविक राजनीतिक विश्लेषण समझिए। पहली बात, यह केवल कांग्रेस की ताकत दिखाने का आयोजन नहीं था। इसमें इंडिया गठबंधन के तमाम घटक दलों की भागीदारी ने इसे व्यापक विपक्षी एकजुटता का स्वरूप दिया। दूसरी बात, इस रैली का मुद्दा किसी एक नेता, किसी एक पार्टी या किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं था। वोटर लिस्ट, एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे सवालों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की बहस से जोड़ दिया।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब किसान, नौजवान, मजदूर, शिक्षक, अधिवक्ता और आम नागरिक एक साथ किसी मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए निकलते हैं, तो उस जनभागीदारी को महज राजनीतिक भीड़ कहकर खारिज करना आसान नहीं होता।

राजनीति में भीड़ जुटाना एक बात है, लेकिन अलग-अलग सामाजिक वर्गों को एक साझा सवाल पर एकजुट करना बिल्कुल दूसरी बात है। राहुल गांधी की शिव की बारात वाली उपमा का राजनीतिक अर्थ भी शायद यही है कि इस यात्रा में किसी एक विचारधारा, जाति, धर्म, वर्ग या पेशे के लोगों के लिए ही जगह नहीं है। जो भी लोकतंत्र, संविधान और अपने मताधिकार को लेकर चिंतित है, वह इसका हिस्सा बन सकता है।

हालांकि, किसी रैली की सफलता का अंतिम पैमाना केवल भीड़ नहीं होती। असली परीक्षा यह है कि आज रामलीला मैदान में उठे सवालों को विपक्ष कितना आगे ले जाता है और क्या यह जनभागीदारी किसी ठोस लोकतांत्रिक परिणाम में बदल पाती है?

लेकिन रामलीला मैदान की इस रैली का एक संदेश साफ है: लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती, बल्कि बाकी दिनों में सवाल पूछने वाली नागरिक भी होती है। और जब सवाल पूछने वाले नागरिक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरते हैं, तो लोकतंत्र की सेहत पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

रविवार को रामलीला मैदान में सिर्फ नेता नहीं जुटे थे, जनता के अलग-अलग हिस्सों की आवाजें भी एक जगह सुनाई दे रही थीं। यही इस रैली का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी होती है।

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